एक इतवार और सब्जी बाज़ार

सुबह से ही घर एक सोंधी सी खुशबू से महक रहा था , समझ गया था आज नाश्ते में श्रीमति जी, कुछ बेहतरीन परोसने वाली है . मैं सहम गया हे भगवान, गयी आज़ की छुट्टी भी पानी में.

बिहारी लिट्टी-चोखे के नये अवतार के साथ नाश्ते की प्लेट के साथ मुस्कुराती धर्मपत्नी हाज़िर थी, कहने लगी — “आज ये तगड़ा नाश्ता कर लो, फिर बताती हूं—आज घर के कामों की लिस्ट — कोई बहाना नहीं — कोई फेस-बुक नहीं कोई लेखन नहीं, आज सिर्फ घर का काम….”.

खैर वो तो अपनी बात कह कर चली गयी… पर हम भी तो हम हैं…. शानदार चटपटे नाश्ते के साथ— सोचा एक पोस्ट ठोक ही देते हैं… डांट ही लगायेगी ना… तो ये कौन सी नयी बात है हमारे लिये.

ऐसा नहीं है कि मैं कोई काम चोर टाईप का पति हूं …

विवाह के बाद से हर इतवार बाज़ार जाना और थैले भर भर कर सब्जियां लाना मेरे जीवन की एक स्थायी, अटल, अनचाही और अनिवार्य (दु:)घटना बन गयी है… 

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