कभी कटी थी पतंग की डोर

115248_1600x1200

14-जनवरी – मकर संक्रांति – इस दिन मैं नागपूर में था . महाराष्ट्र में “सुहागिनों का हल्दी-कुमकुम” और युवकों की “पतंग-उड़ाई” आज के दिन की खासियत होती है .

धरा चमचमाती साड़ियों , गहनों और श्रृंगार किये अपने पति और परिवार की मंगल कामना करती महिलाओं से पटा पड़ा रहता है और आकाश रंग-बिरंगी “पतंगों” से . दोनों तरफ अपनी-अपनी तरह की प्रतिस्पर्धा का महौल ….. इस परंपरा और मनोरंजक प्रतिस्पर्धा के बीच खुद को पाकर एक तसल्ली सी मिल रही थी . पर कहीं न कहीं इस उत्सव की मासूमियत को बाज़ार के शातिर और छुपे खिलाड़ियों की स्वार्थी चालों का शिकार बनते देखने का दुख भी साल रहा था .

colourfu
“मकर-संक्रांति” कभी प्रेम और परिवार का उत्सव होता था, आज इसे भी बाज़ार की नज़र लग गयी है

बात पतंगबाज़ी की करूं तो बचपन में संक्रांति पर पतंग मैं भी उड़ाता था . उस वक़्त इस खर्च के लिये रुपये दो रुपये की पूंजी जोड़ने में महिनों की चिल्लर जोड़नी पड़ती थी . एक पतंग, एक चकरी , एक गुच्छी मंझा और 6-प्लाई के मोदी छाप धागे की एक रील खरीदने में महिनों की बचत स्वाहा हो जाती थी .

एक पतंग को हफ्ते भर पहले से खरीद कर , इस तरह सहेजा और दोस्तों को दिखाया जाता था कि , नयी नवेली दुल्हन की “मुंह-दिखायी” की रस्म शर्मा जाये

उस समय ये सीधा साधा सा स्नेह-पर्व हुआ करता था , कोई दिखावा नहीं कोई तमाशा नहीं . वैसे एक बात बताऊं , अपनी कसट की बचत से खरीदी पतंग से मुझे इतना लगाव हो जाता था कि , जब वो कटती थी तो लगता था – कोई दिल निचोड़ ले गया , कोई डोर नहीं टूटी – अपना दिल टूट गया , तीन चार दिन इसी कचोट और विरह से उबरने में लग जाते . क्या करू अपुन हैं ही इतने संवेदनशील .. एक बार तो पतंग कटने पर इतना बिलख-बिलख के रोया कि कोई क्या किसी अपने सगे के बिछड़ने पर रोता होगा – तब से कसम खा ली – कौन हर साल दिल लगाये … फिर वो टूटे – और हम पछतायें … प्रण कर लिया अब आगे से खुद कभी न तो पतंग खरीदूंगा …न ही …फिर कभी उड़ाऊंगा . अपने से किया वादा आज़ तक निभा रहा हूं . पर दूसरों की खुशी में शामिल होने से कभी कोई गुरेज़ नहीं रहा

मुझे पता नहीं था तब … कि व्यवसायिकता का ये बाज़ार इस सीधे साधे पतंग उड़ाई को भी इतना “ग्लैमरस” बना देगा कि … …..

ये क़ातिलाना अदा इसके लिये तो न जाने कितनी कसमें तोड़ दें लोग

टीवी पर जब वो विज्ञापन देखता हूं …. जिसमें पतंग-लड़ाई में हारी खूबसूरत हसीना —- कैसे अपने दांतों से … लड़के की पतंग का “मंझा” काटती है – और फिर कातिल तिरछी चितवन से – उस लड़के के पौरुष को चैलेंज़ करती हुई जाती है – उसकी आंखों का “वो आग्रह “ कि , आ… और मुझे हसिल कर ले ….. मां कसम लगता है कभी कभी कि — पतंग उड़ाना छोड़ कर भारी गलती कर ली . क्या पता कुदरत कब हमको भी मौका दे देती .

पहले सबकी अपनी एक-एक ही पतंग होती थी , इकलौती महबूबा की तरह , कोई उसके लिये कुछ बोल कर तो देखता — हाथापायी हो जाती थी … कभी वो कट जाती तो जान की बाज़ी लग जाती उसे दूसरों के हाथों में न पड़ने देने का – अक्सर वो कटने के बाद किसी को हासिल होती भी थी तो उसका “जौहर” हो चुका होता था , वो लुटेरों के किसी काम की न होती थी …. और उसके मालिक को ये इत्मिनान होता था कि जान भले ही चली गयी हो उसकी – पर अस्मत नहीं गयी .

और आज मैंने देखा कि लोग एक नहीं – 10-15 पतंगों की थप्पी स्टैंडबाई में रखते है , जोता-वोता — बांध के तैयार — कि एक कटी नहीं कि “ तू नहीं तो , कोई और सही – “ वाली तर्ज़ दुसरी बांध के उड़ा देते हैं . यहां तक कि “कटी-पटंग का मांझा” भी कोई लूटना और लपेटना नहीं चाहता . इधर पतंग कटी नहीं कि उधर हत्थे से मांझा तोड़ कर फेंक देते हैं .

मोहब्बत भी आज़ की पतंगबाज़ी की तरह हो गयी है … न चाहत न कमीटमेंट बस एक कंफर्ट और एक सौदेबाज़ी … एक कटी क्या और दस कटी क्या – न तू कल मेरी थी – न कल मेरी रहेगी …. दिल भी ऐसे तोड़ते-टूटते हैं .. जैसे बिना पछतावे के हत्थे से मांझा तोड़ते हैं .

जब रिश्तों के बंधन को रेशम की डोरी से बांधते थे , तब पतंग के धागे भी सूत के होते थे , आज रिश्ते जितने बनावटी हो गये हैं कि पतंगों को भी उडा‌ने के लिये खतरनाक, जानलेवा “चाईना के नाइलोन माझा “ की मांग बढ़ती जा रही है . कितना साम्य है ना – रिश्तों में और पतंगों में ……..

आज का बाजार – आज़ के विचार –रोज़ की नयी “डेटिंग” , रोज़ के नये रिश्ते — “ one day halt”   या  “One Night-Stay” – “Enjoy-Dude” — आज़ के आनंद की जय हो

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *