एक इतवार और सब्जी बाज़ार

सुबह से ही घर एक सोंधी सी खुशबू से महक रहा था , समझ गया था आज नाश्ते में श्रीमति जी, कुछ बेहतरीन परोसने वाली है . मैं सहम गया हे भगवान, गयी आज़ की छुट्टी भी पानी में.

बिहारी लिट्टी-चोखे के नये अवतार के साथ नाश्ते की प्लेट के साथ मुस्कुराती धर्मपत्नी हाज़िर थी, कहने लगी — “आज ये तगड़ा नाश्ता कर लो, फिर बताती हूं—आज घर के कामों की लिस्ट — कोई बहाना नहीं — कोई फेस-बुक नहीं कोई लेखन नहीं, आज सिर्फ घर का काम….”.

खैर वो तो अपनी बात कह कर चली गयी… पर हम भी तो हम हैं…. शानदार चटपटे नाश्ते के साथ— सोचा एक पोस्ट ठोक ही देते हैं… डांट ही लगायेगी ना… तो ये कौन सी नयी बात है हमारे लिये.

ऐसा नहीं है कि मैं कोई काम चोर टाईप का पति हूं …

विवाह के बाद से हर इतवार बाज़ार जाना और थैले भर भर कर सब्जियां लाना मेरे जीवन की एक स्थायी, अटल, अनचाही और अनिवार्य (दु:)घटना बन गयी है… 

भले ही सप्ताह के सातों दिन ताजी सब्जियां मिल जाती हों , फ़िर भी, अपनी अर्धांगिनी को, आगे के हफ़्ते में अपनी रसोई में पड़ने वाले दुर्भिक्ष की आशंका से निश्चिन्त रखने, मैं हर रविवार बिला-नागा अपने हथियार (थैले) उठाये रणक्षेत्र (बाज़ार) को चल पड़ता हूं ।

बाज़ार में ताज़ी सब्जियां , खासकर मौसमी फ़ल एवं सब्जियों की बहार मुझे सदा से ही लुभाती रही है ।

किसानों एवं विक्रेताओं के अपने हरित खज़ाने पर रह रह कर फ़िरते हाथों का दुलार ,
उन्हें ताज़ादम रखने के लिये किये शीतल जल की बौछार,
इनके गुणों का उच्च-स्वर प्रचार,
अपने माल का वाज़िब दाम पाने की मासूम चाहत और ग्राहकों से इसरार…

मेरे इंतजार में एक सब्जी वाला भैया अक्सर मेरे लिये अच्छी सी सब्जियां छांट के अलग से रख लेता है
मेरा सब्जीवाला भैया मेरे इंतजार में एक सब्जी वाला भैया अक्सर मेरे लिये अच्छी सी सब्जियां छांट के अलग से रख लेता है

ये सब आपको निसर्ग के इनाम-ओ-इकराम से मालामाल कर देने की कुव्वत रखती है । पर यहां रुपल्ली- दो रुपल्ली के लिये होने वाली घिसघिस, सौदेबाजी कभी कभी खटक जाती है । इन सौदेबाजों की फ़ितरत भी अजीब होती है , 10 रु किलो टमाटर मिलें या 10 रु में दो किलो , ये कभी भी खुद को सौदेबाजी के अपने अधिकार से वंचित नहीं रखना चाह्ते । 25 बरस हो गये हैं मुझे भी बाज़ार करते, लेकिन 2-2 रु बचाने वाले इन शूरवीरों में से किसी को भी मैंने अम्बानी बनते नहीं देखा, उलटे वक्त के गुज़रने के साथ उनके चेहरे की मुर्दनगी और उस पर और सस्ते की चाह दर्शाती याचना की रेखाओं को और गहरे होते पाया। रुपये दो रुपये कम करा कर खुद को स्मार्ट समझने का भ्रम पालने वाले , आखिरकार बदले में पाते क्या हैं ? एक बनावटी खुशी, दिमाग में निरन्तर बढ़ती लालच की बेल, जो अन्ततः इनकी पूरी विचार श्रृंखला को ही संदूषित कर देती है । ऐसी छोटी सौदेबाजी से बच पायें तो क्रेता – विक्रेता के बीच एक मृदुल हंसी के रिश्ते बन जाते हैं । मैं कई ऐसे किसानों – व्यापारियों को बरसों से देखता आया हूं ,कुछ के नाम मालूम हैं बहुतों के नहीं , पर मैं उन सब के लिये भइया हूं ।

किसी रविवार ना दिखूं तो , अगले इतवार सभी पूछेंगे,
कैसे हैं भइया ? पिछले बार दिखे नहीं , सब कुशल तो है?

ये निश्छल अपनापन किआज आपको कछु ना देंगे , आज आपके लायक सब्जी नहीं तो कभी कहेंगे—

भइया इ लेई जाओ , अपने खेत की है
पहली तुड़ाई की भिण्डी है , आपके इन्तज़ार में किसी को बेची नहीं

एक गुड़ बेचने वाला हरदम आग्रह करता है , भइया ना खरीदो ,थोड़ा चख लो , शगुन कर दो ,
सोचता हूं , इन सब्जी वालों से सौदेबाज़ी न कर , उन्हें वाज़िब दाम देकर 
मैं वो सब पा जाता हूं , जो कहीं ज्यादा गहरा , ज्यादा प्रगाढ़ है एक अपनापन, उनकी आखों में अपने प्रति आदर, अच्छी क्वालिटी, सही तौल, सही सलाह, और एक अबोला शुभचिन्तन!

इतवार का सब्जी बाज़ार , मैं कभी घाटे में नहीं रहा!

Ravikant Raut—WritingRaut

3 comments on “एक इतवार और सब्जी बाज़ार”

  1. bahut sundar sir ji mai bhi har itwar jata hu jab mai ghar pe hota hu.
    sabji lene 3rd class se do jhole dono side tangakar

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