ऐसा अक्सर क्यूं होता है.

आज आप लोगों से कुछ विचारोत्तेजक बातें करने का मन हो रहा है. आज हम इंसानी फितरतों को विज्ञान के स्थापित नियमों से समझने की कोशिश करते हैं.

अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आपको भी मेरी तरह महसूस होता ही होगा कि — दुनिया. जिन लोगों को, स्वार्थी, दुष्ट, कामचोर, अ-व्यवहार कुशल, संकीर्ण मानसिकता और गैर–समाजिक होने का तगमा देती है —उनका भला ही होता है, (वैसे तो होना उनका बुरा चाहिये–क्योंकि घुट्टी में हमें पिलाये गये संसकारों और विश्वासों के आधार पर मानें तो, होना भी यही चाहिये—पर होता नहीं)—चलिये बुरा न सही… पर कम से कम हम या दूसरे जो अच्छे लोग हैं–उनकी तुलना में उनका कुछ कम अच्छा तो होना ही चाहिये . क्योंकि बुरे का बुरा होता है… जैसे का तैसा होता है… ऐसी बातो का अर्क, ढेरों शिक्षाप्रद कहाँनियों और प्रवचनों –भजनों के माध्यम… से हमारी नसों में सदियों से उतारा जाता रहा है.

“पर वास्तविकता में ऐसा होता क्यों नहीं ?”

यही मेरे विमर्श का विषय है. क्या इतनी विशाल दुनिया मानव निर्मित सिद्धांतों से चलती है–यदि ऐसा है तो–हमें सिखाये गये और उनके पालन को बाध्य किये जा रहे “सज्जनता-समझदारी” के इस नियम के, नियम से ज्यादा अपवाद देखने को क्यों मिलते हैं. या… फिर, जिसे हम गलत मानते हैं, असल में वो गलत नहीं है। लगता तो ये है कि, ये दुनिया और उसकी ये दुनियादारी, भी…. प्रकृति के किसी न किसी “सार्वभौम ‒सत्य  (Universal-truth)” सिद्धांतों के अनुरुप ही काम करती है. जैसे गुरुत्वाकर्षण–का सिद्धांत.

आपने देखा होगा ऐसे लोग–यहां हम उन्हें थोड़ी देर के लिये– “कमीन-टाईप के” या “धूर्त” लोग कह देते हैं–अक्सर इनके आसपास इनके ऐसे परिवार, मित्र सहकर्मी, जुट जाते हैं–जो इनकी “कमीनगी” के बावजूद उनका काम कभी रुकने नहीं देते. इन्हें पत्नी/पति ऐसे मिलते हैं. जो बड़े समझदार, मिलनसार और इनकी कमियों को ढांप कर चलने वाले होते हैं। ऐसों के बच्चे अच्छे मुक़ाम हासिल कर लेते हैं। और तो और जहां ऐसे “धूर्त” काम करते हैं—उन्हें ही कम-काम, कम तनाव वाली और गीली पोस्टिंग मिलती है, भले ही उनके हिस्से का काम करने में… भले लोगों, की कमर टूट जाये, उपर-वाला भी भला इन्हीं का करता है. काम करने वाले तो खटते मरते रहते हैं.

परिवार में अपने दायित्वों के प्रति लापरवाह और उजड्ड होते हुये भी—पैतृक संपत्ति का सबसे बड़ा और अच्छा हिस्सा इनकी झोली में ही गिरता है, आप इनका विरोध भी नहीं कर पाते, क्योंकि आप को समझाने वाले कई ऐसे लोग जुट जाते हैं–जो आपसे ही समझदारी दिखाने को कहेंगे–कि वो तो वाहियात है ही–तुम ही समझ दारी दिखा दो–उसके बाल–बच्चों की शादियों की चिंता भी दूसरे करते हैं—अपने खुद के बच्चों का हक़ मारकर… ये जानते हुये भी कि वो कभी सुधरने वाले नहीं. ऐसे लोग और ऐसी ही कई और वजहें, लोगों में, पति-पत्नी के बीच कलह का कारण बनी रहती है. पर उन्हें इससे क्या, वो तो अपनी मस्ती और अपनी शर्तों पर शान से जीते रहते हैं। आप अपना पेट काटते जाओं अपने परिवार का खून जलाते जाओ, पर वो तो हमेशा मजे में.

सुबह की कड़क चाय पीने के बाद मेरे अंदर का “Abstract-Thinker” जाग गया. मैं सोचने लगा, सही गलत, अच्छे बुरे के ये नियम तो इंसान की अपनी सुविधाओं के लिये बनायी गयी व्यवस्थायें हैं। इस विशाल सृष्टि ने सिर्फ इंसानों का ठेका ले के तो नहीं रखा है कि वो, इंसानों के लिये सही क्या और गलत क्या ये तय करने में ही लगी रहे. उस पर तो इस धरती के समस्त जीवधारियों और निर्जीव रचनाओं, का बराबर ख्याल रखते हुये समग्र व्यवस्था को सुचारू रखने का भार होता है. तो फिर, ज़ाहिर है, उसने भी ऐसे कामन “सार्वभौमिक-सिद्धांत” अवश्य बनाये होंगे जो सिर्फ इंसानों पर ही नहीं अपितु उसकी समस्त रचनाओं पर भी समान रूप से लागू होते हों। भले ही सृष्टि चलाना हो या इंसानी रिश्ते, प्रकृति के नियम तो एक से ही होने चाहियें।

उपर कही समस्या के या उसके न्यायसंगत होने के पक्ष में प्रमाण पाने मैंनें भौतिकी के नियमों पर नज़र दौड़ानी शुरू की . पहला नियम जिस पर मेरी नज़र अटकी वो था—

नियम 1

— “पदार्थ / उर्जा की अविनाशिता का नियम”—जिसके अनुसार पदार्थ /उर्ज़ा न तो पैदा की जकती है न उसका नाश होता है , वो केवल रूप बदलती हैं – याने ब्रह्माण्ड का सकल पदार्थ/उर्ज़ा मान सदा स्थिर रहता है .

याने सज्जनता और दुर्जनता एक ही मूल तत्व के दो रुप हैं.

नियम 2

जितना पदार्थ (Matter) होता है उसके बराबर मात्रा में प्रति-पदार्थ (Anti-matter) भी आवश्यक रुप से मौज़ूद होता है. अब इस आधार पर अपनी बात करें तो जितनी “सज्जनता” है उसके बराबर मात्रा में “दुर्जनता” का होना भी इस सृष्टि अवश्यंभावी है.

नियम 3

ये उष्मा–गतिकी का नियम (Law of Thermodynamics) है. “हर निकाय के और उसके परिवेश के बीच सतत अन्तर्क्रिया चलती रहती है. जब तक कि परस्पर साम्य स्थापित न हो जाये.

“There is a continuous inter-action between the body and its surroundings, until an equilibrium established.”

निकाय से परिवेश की अंतर-क्रिया प्रकृति का ये सिद्धांत सिर्फ पदार्थ पर ही नहीं इंसानी रिश्तोंं पर भी समान रूप से लागू होता है .

उदाहरण के लिये चाय का एक गर्म प्याला यूं ही छोड़ दिया जाये तो वह तब तक अपनी उष्मा वातावरण में खोता रहेगा (या उससे उसका परिवेश सोखता रहेगा) जब तक तक कि दोनो का ताप समान न हो जाये, इसी तरह कोल्ड-ड्रिंक की एक बोतल यूं ही छोड़ दिये जाने पर अपने परिवेश से तब तक उष्मा सोखती रहेगी (या उसका परिवेश उसे तब तक उष्मा देता रहेगा) जब तक दोनों का ताप बराबर न हो जाये.

इन तीनों सर्वस्वीकृत सिद्धांतों में मुझे अपना समाधान मिला—

1-अच्छाई या बुराई दो अलग चीजें न हो कर एक ही फ़ितरत के दो पहलू हैं. एक चीज़ किसी के लिये अच्छाई मान कर कर देते हो तो हो सकता है किसी के साथ अन्याय हो रहा हो। जब तक आप चाहोगे कोई एक रहे, दूसरे का रहना अवश्यंभावी है. ये आपकी व्यक्तिगत पसंद है आप किसके साथ रहें। सृष्टि को इस बात से कोई लेना देना नहीं.
2-कोई कितनी भी कोशिश कर ले इस दुनिया से न अच्छाई मिट सकती है न ही बुराई. अलबता बुराई को खत्म करने के नाम पर धर्म-गुरुओं, धार्मिक-प्रतिष्ठानों की दुकानदारी बेशक फलती फूलती रहेगी.
3- जब कोई बुरा, लोभी, मतलबी आदमी होगा तो प्रकृति उसके चारों ओर ऐसे लोगों का परिवेश खड़ा कर देगी, जो उसकी बुराईयों को ढ़ांकेंगे, अपना हित त्याग कर उसका भला करेंगे.

यदि कोई बहुत सज्जन और भला, दयालु होगा तो उसे नोचने के लिये प्रकृति उसके चारों ओर बुरी घटनाओं और बुरे चरित्रों का जाल बुन देगी, जो उसका फायदा तब तक उठायेंगे जब तक उससे कुछ भी लेने को बाकी न रह जाय. याने बाडी और सराउंडिंन्ग के बीच साम्य स्थापित हो कर रहेगा.

परमसत्ता अपने चयन में इस बात की चिंता नहीं करती किसमें अच्छाई रोपना है ताकि उसको पुण्य मिले और किसमें बुराई रोपना है ताकि उसको दण्ड दिया जा सके, उसके लिये व्यक्ति-विशेष नहीं. संख्या मायने रखती है. वो अक्रमागत चयन (Random Selection) का सिद्धांत पालन करती है.

वरना किसी भले के घर सब भले क्यूं नहीं होते, सभी बुरों का एक जैसा बुरा क्यों नहीं होता। प्राकृतिक आपदा, दुर्घटनाओं, आतंकी हमलों में मरने वाले, सिर्फ मरते हैं वहां सिर्फ संख्या होती है, कभी अच्छे बुरे का अनुपात या समानुपात नहीं होता.

याने सृष्टि को अपनी कुल संख्या की चिंता रहती है. तुम अच्छे हो या बुरे हो, सर्वशक्तिशाली की नज़र में इस बात की कोई अहमियत नहीं.

ये आपका विकल्प है, जो मन को भाये, जो अच्छा लगे करो, पर शिकायत मत करो। उसे संतुलन बनाना होगा तो वो वही करेगा जो उसका सिद्धांत कहता है। आपने सबका अच्छा किया है तो इसका ये मतलब नहीं कि आपका एक्सीडेंट नहीं होगा, या कोई आपको लूटेगा नहीं, या आपका कोई नुकसान नहीं होगा, कि आपको और आपके परिवार को कोई गंभीर बिमारी नहीं होगी, या कोई शर्मनाक़ परिस्थिति निर्मित नहीं होगी.

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