कभी कटी थी पतंग की डोर

14-जनवरी – मकर संक्रांति – इस दिन मैं नागपूर में था . महाराष्ट्र में “सुहागिनों का हल्दी-कुमकुम” और युवकों की “पतंग-उड़ाई” आज के दिन की खासियत होती है .

धरा चमचमाती साड़ियों , गहनों और श्रृंगार किये अपने पति और परिवार की मंगल कामना करती महिलाओं से पटा पड़ा रहता है और आकाश रंग-बिरंगी “पतंगों” से . दोनों तरफ अपनी-अपनी तरह की प्रतिस्पर्धा का महौल ….. इस परंपरा और मनोरंजक प्रतिस्पर्धा के बीच खुद को पाकर एक तसल्ली सी मिल रही थी . पर कहीं न कहीं इस उत्सव की मासूमियत को बाज़ार के शातिर और छुपे खिलाड़ियों की स्वार्थी चालों का शिकार बनते देखने का दुख भी साल रहा था .

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“मकर-संक्रांति” कभी प्रेम और परिवार का उत्सव होता था, आज इसे भी बाज़ार की नज़र लग गयी है

बात पतंगबाज़ी की करूं तो बचपन में संक्रांति पर पतंग मैं भी उड़ाता था . उस वक़्त इस खर्च के लिये रुपये दो रुपये की पूंजी जोड़ने में महिनों की चिल्लर जोड़नी पड़ती थी . एक पतंग, एक चकरी , एक गुच्छी मंझा और 6-प्लाई के मोदी छाप धागे की एक रील खरीदने में महिनों की बचत स्वाहा हो जाती थी .

एक पतंग को हफ्ते भर पहले से खरीद कर , इस तरह सहेजा और दोस्तों को दिखाया जाता था कि , नयी नवेली दुल्हन की “मुंह-दिखायी” की रस्म शर्मा जाये

उस समय ये सीधा साधा सा स्नेह-पर्व हुआ करता था , कोई दिखावा नहीं कोई तमाशा नहीं . वैसे एक बात बताऊं , अपनी कसट की बचत से खरीदी पतंग से मुझे इतना लगाव हो जाता था कि , जब वो कटती थी तो लगता था – कोई दिल निचोड़ ले गया , कोई डोर नहीं टूटी – अपना दिल टूट गया , तीन चार दिन इसी कचोट और विरह से उबरने में लग जाते . क्या करू अपुन हैं ही इतने संवेदनशील .. एक बार तो पतंग कटने पर इतना बिलख-बिलख के रोया कि कोई क्या किसी अपने सगे के बिछड़ने पर रोता होगा – तब से कसम खा ली – कौन हर साल दिल लगाये … फिर वो टूटे – और हम पछतायें … प्रण कर लिया अब आगे से खुद कभी न तो पतंग खरीदूंगा …न ही …फिर कभी उड़ाऊंगा . अपने से किया वादा आज़ तक निभा रहा हूं . पर दूसरों की खुशी में शामिल होने से कभी कोई गुरेज़ नहीं रहा

मुझे पता नहीं था तब … कि व्यवसायिकता का ये बाज़ार इस सीधे साधे पतंग उड़ाई को भी इतना “ग्लैमरस” बना देगा कि … …..

ये क़ातिलाना अदा इसके लिये तो न जाने कितनी कसमें तोड़ दें लोग

टीवी पर जब वो विज्ञापन देखता हूं …. जिसमें पतंग-लड़ाई में हारी खूबसूरत हसीना —- कैसे अपने दांतों से … लड़के की पतंग का “मंझा” काटती है – और फिर कातिल तिरछी चितवन से – उस लड़के के पौरुष को चैलेंज़ करती हुई जाती है – उसकी आंखों का “वो आग्रह “ कि , आ… और मुझे हसिल कर ले ….. मां कसम लगता है कभी कभी कि — पतंग उड़ाना छोड़ कर भारी गलती कर ली . क्या पता कुदरत कब हमको भी मौका दे देती .

पहले सबकी अपनी एक-एक ही पतंग होती थी , इकलौती महबूबा की तरह , कोई उसके लिये कुछ बोल कर तो देखता — हाथापायी हो जाती थी … कभी वो कट जाती तो जान की बाज़ी लग जाती उसे दूसरों के हाथों में न पड़ने देने का – अक्सर वो कटने के बाद किसी को हासिल होती भी थी तो उसका “जौहर” हो चुका होता था , वो लुटेरों के किसी काम की न होती थी …. और उसके मालिक को ये इत्मिनान होता था कि जान भले ही चली गयी हो उसकी – पर अस्मत नहीं गयी .

और आज मैंने देखा कि लोग एक नहीं – 10-15 पतंगों की थप्पी स्टैंडबाई में रखते है , जोता-वोता — बांध के तैयार — कि एक कटी नहीं कि “ तू नहीं तो , कोई और सही – “ वाली तर्ज़ दुसरी बांध के उड़ा देते हैं . यहां तक कि “कटी-पटंग का मांझा” भी कोई लूटना और लपेटना नहीं चाहता . इधर पतंग कटी नहीं कि उधर हत्थे से मांझा तोड़ कर फेंक देते हैं .

मोहब्बत भी आज़ की पतंगबाज़ी की तरह हो गयी है … न चाहत न कमीटमेंट बस एक कंफर्ट और एक सौदेबाज़ी … एक कटी क्या और दस कटी क्या – न तू कल मेरी थी – न कल मेरी रहेगी …. दिल भी ऐसे तोड़ते-टूटते हैं .. जैसे बिना पछतावे के हत्थे से मांझा तोड़ते हैं .

जब रिश्तों के बंधन को रेशम की डोरी से बांधते थे , तब पतंग के धागे भी सूत के होते थे , आज रिश्ते जितने बनावटी हो गये हैं कि पतंगों को भी उडा‌ने के लिये खतरनाक, जानलेवा “चाईना के नाइलोन माझा “ की मांग बढ़ती जा रही है . कितना साम्य है ना – रिश्तों में और पतंगों में ……..

आज का बाजार – आज़ के विचार –रोज़ की नयी “डेटिंग” , रोज़ के नये रिश्ते — “ one day halt”   या  “One Night-Stay” – “Enjoy-Dude” — आज़ के आनंद की जय हो

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में

ऐसा अक्सर क्यूं होता है.

आज आप लोगों से कुछ विचारोत्तेजक बातें करने का मन हो रहा है. आज हम इंसानी फितरतों को विज्ञान के स्थापित नियमों से समझने की कोशिश करते हैं.

अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आपको भी मेरी तरह महसूस होता ही होगा कि — दुनिया. जिन लोगों को, स्वार्थी, दुष्ट, कामचोर, अ-व्यवहार कुशल, संकीर्ण मानसिकता और गैर–समाजिक होने का तगमा देती है —उनका भला ही होता है, (वैसे तो होना उनका बुरा चाहिये–क्योंकि घुट्टी में हमें पिलाये गये संसकारों और विश्वासों के आधार पर मानें तो, होना भी यही चाहिये—पर होता नहीं)—चलिये बुरा न सही… पर कम से कम हम या दूसरे जो अच्छे लोग हैं–उनकी तुलना में उनका कुछ कम अच्छा तो होना ही चाहिये . क्योंकि बुरे का बुरा होता है… जैसे का तैसा होता है… ऐसी बातो का अर्क, ढेरों शिक्षाप्रद कहाँनियों और प्रवचनों –भजनों के माध्यम… से हमारी नसों में सदियों से उतारा जाता रहा है.

“पर वास्तविकता में ऐसा होता क्यों नहीं ?”

यही मेरे विमर्श का विषय है. क्या इतनी विशाल दुनिया मानव निर्मित सिद्धांतों से चलती है–यदि ऐसा है तो–हमें सिखाये गये और उनके पालन को बाध्य किये जा रहे “सज्जनता-समझदारी” के इस नियम के, नियम से ज्यादा अपवाद देखने को क्यों मिलते हैं. या… फिर, जिसे हम गलत मानते हैं, असल में वो गलत नहीं है। लगता तो ये है कि, ये दुनिया और उसकी ये दुनियादारी, भी…. प्रकृति के किसी न किसी “सार्वभौम ‒सत्य  (Universal-truth)” सिद्धांतों के अनुरुप ही काम करती है. जैसे गुरुत्वाकर्षण–का सिद्धांत.

आपने देखा होगा ऐसे लोग–यहां हम उन्हें थोड़ी देर के लिये– “कमीन-टाईप के” या “धूर्त” लोग कह देते हैं–अक्सर इनके आसपास इनके ऐसे परिवार, मित्र सहकर्मी, जुट जाते हैं–जो इनकी “कमीनगी” के बावजूद उनका काम कभी रुकने नहीं देते. इन्हें पत्नी/पति ऐसे मिलते हैं. जो बड़े समझदार, मिलनसार और इनकी कमियों को ढांप कर चलने वाले होते हैं। ऐसों के बच्चे अच्छे मुक़ाम हासिल कर लेते हैं। और तो और जहां ऐसे “धूर्त” काम करते हैं—उन्हें ही कम-काम, कम तनाव वाली और गीली पोस्टिंग मिलती है, भले ही उनके हिस्से का काम करने में… भले लोगों, की कमर टूट जाये, उपर-वाला भी भला इन्हीं का करता है. काम करने वाले तो खटते मरते रहते हैं.

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एक इतवार और सब्जी बाज़ार

सुबह से ही घर एक सोंधी सी खुशबू से महक रहा था , समझ गया था आज नाश्ते में श्रीमति जी, कुछ बेहतरीन परोसने वाली है . मैं सहम गया हे भगवान, गयी आज़ की छुट्टी भी पानी में.

बिहारी लिट्टी-चोखे के नये अवतार के साथ नाश्ते की प्लेट के साथ मुस्कुराती धर्मपत्नी हाज़िर थी, कहने लगी — “आज ये तगड़ा नाश्ता कर लो, फिर बताती हूं—आज घर के कामों की लिस्ट — कोई बहाना नहीं — कोई फेस-बुक नहीं कोई लेखन नहीं, आज सिर्फ घर का काम….”.

खैर वो तो अपनी बात कह कर चली गयी… पर हम भी तो हम हैं…. शानदार चटपटे नाश्ते के साथ— सोचा एक पोस्ट ठोक ही देते हैं… डांट ही लगायेगी ना… तो ये कौन सी नयी बात है हमारे लिये.

ऐसा नहीं है कि मैं कोई काम चोर टाईप का पति हूं …

विवाह के बाद से हर इतवार बाज़ार जाना और थैले भर भर कर सब्जियां लाना मेरे जीवन की एक स्थायी, अटल, अनचाही और अनिवार्य (दु:)घटना बन गयी है… 

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